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ग्रीन कार्ड वाले नागरिकों के Facebook अकाउंट पर उनका राजनैतिक झुकाव देख कर, उन्हें US में घुसने दिया जायेगा

आपके Facebook कितने महत्वपूर्ण हैं? अगर एक US के वकील की मानें तो ये आपके US इमिग्रेशन में प्रवेश लेने के लिये बहुत ही ज़रूरी हैं। ये कोई भद्दा मज़ाक नहीं, बल्कि सच्चाई है।

ह्यूस्टन की वकील माना येगान के अनुसार, राष्ट्रपती ट्रंप के सात देशों के मुसलिमों के देश में प्रवेश को रोकने का आदेश पार्क करने के कुछ समय में ही, कुछ ग्रीन कार्ड वाले नागरिकों कों अमेरिकी हवाई अड्डों पर सीमा सुरक्षा बल ने रोक दिया। बैन सात मध्य पूर्वी देशों पर लगा है और होमलैंड सुरक्षा डिपार्टमेंट की मानें तो न केवल इमिग्रेंटों को, बल्कि वहां पहले से रह रहे नागरिकों को भी प्रभावित करेगा।

इस बैन की चपेट में आये सात देश ईरान, ईराक, लिबिया, सोमालिया, सुडान, सीरिया व यमन हैं। सुश्री येगान की मानें तो इस फयर्मान ने कुछ ऐसी चीज़ों की शुरवात कर दी है, जो कि बिलकुल भी आमंत्रित नहीं हैं। इसमें ग्रीन कार्ड वाले लोगों (जिनके पास अमेरिका में कार्य करने की अनुमती है) को भी हवाई अड्डों पर रोका जा रहा है, उनसे घंटों पूछ-ताछ करी जा रही है, उनसे उनके राजनैतिक विचार पूछे जा रहे हैं और यहां तक कि उनके Facebook अकाउंट मांगे जा रहे हैं, जिससे कि वे कोई आपत्तिजनक बात ढूंढ़ सकें।

देश की सुरक्षा अपनी जगह है, परंतु उन्हें लोगों को US में घुसने से रोकना जो पहले ही वहां वर्षों से रह रहे हैं, काम कर रहे हैं और यहां तक कि इसके पूरी तरह अपने घर बनाने के लिये तैयार हैं, अपने देश की ही छांटने के कार्य पर उंगली उठाना है। ये तो बिलकुल वैसे ही करना हुआ कि “हे, हमने आपको ग़लती से ग्रीन कार्ड दे दिया। ज़रा हमें अपना Facebook दिखाइये जिससे हम पता लगा सकें कि आप सही व्यक्ति हैं।”

बैन पर पहले ही कई लोगों ने कई अदालतों में दावे ठोक दिये हैं, मुख्यतः उन्होंने, जिन्हें वर्षों देश में रहने के बाद भी घंटों हवाई अड्डों पर रोक कर रखा गया – यहां तक कि सरकारी अधिकारयों को भी। परंतु जो हो रहा है, वो हो रहा है। कई अंतर्राष्ट्रीय एयरलाइनों ने भी इस निर्णय के चलते उन सात देशों से US की उड़ानें रद्द कर दी हैं।

हमारे अनुसार तो इसका कोई तुक व़नगीं बनता है। अगर आप किसी एक जाति के प्रति भेदभाव करते हैं, जो कि सीरिया के इसाइयों को आने देने के विचार से यही लग रहा है, तो उसे वही बुलाइये। तो क्या US सच में मज़हब के बिनाह पर भेदभाव कर रही है? और किसी को भी अपने देश में आने देने का निर्णय उनके Facebook अकाउंट के आधार पर लेना?

बुरा मत मानियेगा, परंतु आप किसी एक देश या मज़हब पर उंगली उठा कर ये नहींं कह सकते कि आपकी सभी समसियाओं का कारण यही है। ये बैन आतंकवाद को “इसलामी आतंकवाद” को नाम देना और कुछ ही कदम दूर है दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मज़हब के कुछ इमिग्रेंटों के विरुद्ध भेदभाव है।

और ये भेदभाव अमेरिकी लोगों के मध्य भी बहुत प्रचलित नहीं है। पिछली बार जब इतने बड़े पैमाने पर भेदभाव हुआ था, तो उसके कारण दुनिया की सबसे बड़े सिविल युद्ध का कारण बना। परंतु जैसा कि कई लीडरों ने कहा, देश तो इमिग्रेंटों से ही भरा पड़ा है और तो और, उन्होंने US को महान बनाने में बहुत योद़गदान दिया है।

अंतर्राष्ट्रीय इमिग्रेशन संस्थान ने इस कदम की निंदा करते हुए कहा:

रेफ़्यूजियों और माइगिरेटरों की ज़रूरतें दुनिया में बहुत अधिक हो गयी हैं, और US पुनः सेटलमेंट कार्यक्रम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण में से एक है।

सभी देशों को रेफ़्यूजियों को आमंत्रित करने से सभी को लाभ होता है। इससे दुनिया के कुछ सबसे अधिक खतरे में पड़े लोगों को सुरक्षा मिली है और वहीं उन्होंने इस देश को भी बहुत कुछ दिया है।

अब देखने वाली बात ये है कि राष्ट्रपती इस निर्णय के लिये क्या कारण बताते हैं या, बताते भी हैं या नहीं। बहरहाल, अगले शुक्रवार उनकी दुनिया के कुछ सबसे बड़ी तकनीक कंपनियों के प्रमुखों के साथ मीटिंग है, जिनमें से कुछ तो ऐसे हैं, जिन्होंने इस मुद्दे पर अपने विचार बहुत कड़े शब्दों में वक्त किये। अब देखते हैं कि इस मीटिंग का परिणाम क्या होता है।

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यह साफ़ तरह से स्पष्ट हो गया है, की प्रौद्योगिकी विकास हमारी मानवता को पार कर चुका है |
अल्बर्ट आइंस्टीन