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इसरो ने अपने वायुमंडलीय ऑक्सीजन से चलने वाले ‘स्क्रैमजेट’ इंजन का किया सफल परिक्षण

भारतीय अंतरिक्ष शोध संस्थान (ISRO) ने अपने कीर्तिमानों की सूचि में एक और कीर्तिमान जोड़ा और रविवार को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (DSRC), श्रीहरीकोटा में ही विकसित किया गया स्क्रैमजेट इंजन सफलतापूर्वक परीक्षित किया।

ये इनके लिये बहुत बड़ी उपलब्धी है और पुनः प्रयोग हो सकने वाले वाहन (RLV) को हायपरसॉनिक स्पीड पर लांच करने का प्रारंभ।

इस मिशन ने ISRO को कई क्षेत्रों में गुणवत्ता के लिये परीक्षित किया, जिसमें सूपरसॉनिक गति पर हवा से चलने वाले इंजनों की इग्निशन, सूपरसॉनिक गति पर उनकी फ़्लेम का चालू रहना, और इसमें प्रयुक्त हुए अन्य भविष्य के सिस्टम, जैसे कि हवा इंटेक मेकेनिज़म और फ़्यूल इंजेक्शन सिस्टम को भी टेस्ट किया गया, जो कि पूरी तरह सफल रहा और इस परीक्षण के सभी उद्देश्य पूरे हुए। Mach 6 की स्पीड पर इस हायपरसॉनिक उड़ान का ISRO द्वारा Scramjet इंजन का यह मेडेन परीक्षण भी था।

ISRO ने आज इस उपलब्धी की घोषणा करते हुए कहा:

“हवा से चलने वाले प्रोपल्शन सिस्टम को सच बनाने कि ओर कार्य करते हुए, आज (अगस्त 28, 2016) को ISRO के पहले Scramjet Engine को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, SHAR, श्रीहरीकोटा से पहली बार सफलतापूर्वक परीक्षित किया गया।

12 घंटों के रुकावट रहित काउंटडाउन के बाद, Scarmjet Engine युक्त सॉलिड रॉकेट बूसिटर ने 0600 घंटों (प्रातः 06:00) पर उड़ान भरी। ISRO का प्लान था – रॉकेट का बूस्टर चरण से आगे बढ़ना, दूसरे चरण के सॉलिड रॉकेट का चालू होना, Scramjet इंजन का 5 सेकेंड तक कार्य करना और फिर बर्न आउट हो जाना, जो कि दूसरे चरण पर होता है।

सब कुछ प्लान के मुताबिक ही हुआ – जो कि अब ISRO की आदत बन चुकी है – और 5 मिनट की उड़ान के बाद, वाहन बंगाल की खाड़ी में गिरा।

परीक्षण में वायूमंडल के हायड्रोजन का इंधन के रूप मे प्रयोग हुआ और ऑक्सीजन का ऑक्सिडाइज़र के रूप में। ये महत्वपूर्ण था, क्योंकि विमान ने इसे लेकर जाने और प्रयोग करने की जगह सफलतापूर्वक इसे हवा से लिया। इस बदलाव के कारण, वैज्ञानिकों का मानना है कि वे लिफ़्ट ऑफ़ के समय विमान का भार 50% तक कम कर देंगे, जो कि बहतरीन खबर है, जिसके कारण, ऑर्बिट में और भी भारी सामान भेजा जा सकेगा।

इस प्रयोग के लिये इस्तेमाल हुआ सॉलिड रॉकेट बूस्टर ISRO के अडवांस तकनीक वाहन (ATV) की मदद से लगाया गया। ATV दरसल दो चरणों वाला स्पिन स्टेबलाइज़ लांचर है, और ये अलग है, क्योंकि इसमें बूस्टर और लांचर, दो अलग-अलग चरण होते हैं। क्योंकि कम समय में रॉकेट ने कम समय के लिये सूपरसॉनिक स्पीड मेंटेन कर ली, माना जा रहा है कि वो ये लंबे समय तक भी यह कर सकेगा।

“मुख्य परेशानी थी हवा में हवा से चलने वाले इंजन को शुरू करना और सूपरसॉनिक गति पर फ़्लेम को बनाये रखना। अगर वो 5 सेकेंड के लिये चल गया तो 1000 सेकेंडों के लिये भी चल जायेगा।”

वैश्विक संस्थाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाने के लिये आगे बढ़ रहे इस संस्था ने अपने द्वारा झेले गये चैलेंजों को भी विस्तार में बताया।

“Scramjet इंजन बनाते समय जो तकनीकी दिक्कतें ISRO को आयीं, उनमें हायपरसॉनिक इंजन के हवा के इंटेक को डिज़ाइन और विकसित करना, सूपरसॉनिक कंबस्टर, ऊंचे तापमान को सह सकने वाले मटेरियल, हायपरसॉनिक फ़्लो स्टिमुलेट करने के लिये कंप्यूटेशनल टूल, अनेक फ़्लाइट गतियों पर इंजन की चलने की क्षमता, पूरी थरमल मैनेजमेंट और इंजनों की ग्राउंड टेस्टिंग शामिल है।”

बहरहाल, इस सफलता ने भारत को मात्र चार देशों के एक ऐसे एक्स्क्लूज़िव क्लब में ला खड़ा किया है, जो कि इस तरह Scramjet इंजन को लांच करने की क्षमता रखते हैं। जहां NASA ने इसे 2004 में ही परीक्षित कर लिया था, ISRO ने इसका भूमिगत परीक्षण 2006 में किया। इस परीक्षण के साथ, ISRO भी अब Scramjet इंजन लांच करने की क्षमता रखता है।

हम भारतियों के लिये ये एक बहुत ही गौरवशाली समय है।

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यह साफ़ तरह से स्पष्ट हो गया है, की प्रौद्योगिकी विकास हमारी मानवता को पार कर चुका है |
अल्बर्ट आइंस्टीन