खबर डिजिटल इंडिया मेक इन इंडिया

मोदी सरकार ने Tesla को अपनी विशाल ‘जीगाफ़ैक्ट्री’ भारत में खोलने के लिये आमंत्रित किया

तो आपका इलेक्ट्रॉनिक कारों के बारे में क्या खयाल है? हां, वही कारें, जिनमें तेल की टंकी की जगह बैटरियां होती थीं और इलॉन मस्क के अपना जादू चलाने से पहले वे बहुत भद्दी भी दिखती थीं। अगर आपको वे पसंद हैं तो शायद हमारे पास आपके लिये एक अच्छी खबर हो सकती है। संभवतः मोदी सराकर ने Tesla को अपनी निर्माण फ़ैक्ट्रियां भारत में लगाने का आमंत्रण दिया है।

सड़क व परिवहन के युनियन मंत्री नितिन गडकरी ने Tesla से भारत को अपने दक्षिण एशिया का निर्माण का केंद्र बनाने की बात कही और उन्होंने इस डील को और भी आकर्षक ये कह के बनाया कि वे अपने पसंद की कोई भी बंदरगाह के करीब की ज़मीन चुन सकते हैं। समुद्र से निकटता से Tesla को अपने प्रोडक्ट दूसरे बाज़ारों में ले जाने के लिये सुविधा होगी।

ये घोषणा शुक्रवार को गडकरी के Tesla के सैन फ़्रांसिसको की फ़ैक्ट्री जाने के बाद करी गयी। उपमहाद्वीप के सबसे बहतरीन स्थानों के साथ मंत्री ने Tesla के साथ स्थानीय कंपनियों के सहयोक व साझेदारी को बढ़ावा देने का भी वादा किया है – जब और अगर वे भारत में अपनी फ़ैक्ट्री खोलें तो।

कारों के साथ, मंत्री जी ने कमर्शियल व पबलिक वाहनों के भी इलेक्ट्रिफ़िकेशन में रुची दिखायी। उन्होंने बायो-इंधन, CNG, इथनॉल और इलेक्ट्रिक वाहनों के ज़रिये भारत में प्रदूषण कम करने के अपने मंत्रालय के लक्ष्य पर भी ज़ोर डाला।

इस घोषणा की नींव तब ही पड़ गयी थी जब पिछले वर्ष प्रधानमंत्री मोदी अपनी US यात्रा के दौरान Tesla की फ़ैक्ट्रियों में गये थे और उन्हें स्वयं ईलॉन मस्क ने वहां का भ्रमण कराया था। मस्क ने भी अपने निम्नलिखित बयान से भारत में Tesla के पदचिह्नों के संकेत दिये थे:

“बड़ी स्थानीय डिमांड के कारण, आने वाले समय में भारत में एक जीगाफ़ैक्ट्री बहुत उचित लगती है।”

खैर, सड़क व परिवहन मंत्री होने के कारण, प्रदूषण श्री गडकरी के लिये एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है। भारत में Tesla को निमंत्रण देकर, सरकार देश के पर्यावरण सिनैरियो को लेकर एक छोटा पर महत्वपूर्ण कदम उठा रही है, और साथ ही बहुत सी रोज़गार संभावनायें भी ला रही हैं।

अगर ये हुआ, तो 2013 के राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन प्लान (NEMMP) में भी थोड़ी जान आ जायेगी, जिसका उद्देश्य 2020 तक भारतीय सड़कों पर छः मिलियन इलेक्ट्रिक वाहन ले आना था। अब अगर UPA सरकार ने कोई ऐसी गुप्त फ़ैक्ट्री नहीं खोल रखी जो कि ऐसी कारें मुफ़्त में बांटे, तो ये मिशन पूरा करने के लिये आज भी हम उसी स्थान पर हैं, जहां 2013 में थे।

भले ही कारों को एक्स्पोर्ट करने के लिये निर्माण केंद्र बनाने में और स्थानीय बाज़ारों में कार बेचने में बहुत अंतर है, कारें बनाना बहतर विकल्प है, क्योंकि दूसरे विकल्प के लिये देश के इंफ़्रास्ट्रक्चर में भी बहुत से बदलाव लाने होंगे, जैसे कि चार्जिंग पोर्ट, मेंटेनेंस केंद्र और अच्छी पावर सप्लाय। मेरा मतलब है कि अगर आपको पता है कि दूर-दूर तक कोई चार्जिंग पॉइंट नहीं है, तो आपके पास नवीनतम इलेक्ट्रॉनिक कार हो, पर वो रहेगी तो बेकार ही।

भले ही भारतियों नें इलेक्ट्रिक कारों कि ओर रुची दिखायी हो और 110% कस्टम ड्यूटी देने के बाद भी अनेक बैटरी वाली कारें इंपोर्ट करी जा रही हों, वो भी मुख्यतः चीन से, तो कारों के निर्माण से अंत में भारत के लिये भी कारें आ सकती हैं।

Add Comment

Click here to post a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

यह साफ़ तरह से स्पष्ट हो गया है, की प्रौद्योगिकी विकास हमारी मानवता को पार कर चुका है |
अल्बर्ट आइंस्टीन